अरवल जिले के सदर प्रखंड स्थित परासी ग्राम पंचायत में भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर तीन महीने पहले पूरी हो चुकी जांच के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं होने से मामला तूल पकड़ता जा रहा है। शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि दोषी मुखिया को बचाने की कोशिश की जा रही है, जबकि जांच में अनियमितताएं स्पष्ट रूप से सामने आ चुकी हैं।
ग्राम परासी निवासी शशिकांत कुमार एवं सैकड़ों ग्रामीणों ने पंचायत की मुखिया मुसर सुल्ताना ताज पर 15वीं वित्त आयोग एवं षष्ठम राज्य वित्त आयोग मद से संचालित योजनाओं में भारी भ्रष्टाचार और अनियमितता का आरोप लगाते हुए निगरानी विभाग, पटना तथा जिलाधिकारी अरवल को आवेदन दिया था। शिकायत के आधार पर निगरानी विभाग ने अप्रैल और अगस्त 2025 में जांच के निर्देश जारी किए थे, जिसके बाद जिलाधिकारी अरवल ने उप विकास आयुक्त को जांच कर कार्रवाई करने का आदेश दिया।
उप विकास आयुक्त के निर्देश पर गठित जांच दल ने 20 नवंबर 2025 को योजनाओं की स्थलीय एवं अभिलेखीय जांच की। जांच टीम में डीआरडीए अरवल के निदेशक (लेखा प्रशासन एवं स्वनियोजन) रितेश कुमार और मनरेगा के सहायक अभियंता संजय गांधी शामिल थे। जांच के दौरान कई योजनाओं में गंभीर अनियमितताएं और वित्तीय गड़बड़ियां पाई गईं। 29 नवंबर 2025 को जांच प्रतिवेदन उप विकास आयुक्त को सौंप दिया गया था।
बताया जा रहा है कि जिलाधिकारी के निर्देश पर पूरी जांच रिपोर्ट और संबंधित अभिलेख जिला पंचायत राज पदाधिकारी को दो माह पहले ही कार्रवाई के लिए भेज दिए गए थे। इसके बावजूद अब तक किसी प्रकार की दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई है। इस बीच निगरानी विभाग द्वारा भी बार-बार कार्रवाई का निर्देश दिया जाता रहा है।
न्याय की मांग को लेकर शिकायतकर्ता शशिकांत कुमार लगातार जिलाधिकारी के जनता दरबार में आवेदन दे रहे हैं। उन्होंने 19 दिसंबर 2025, 27 जनवरी 2026, 9 फरवरी 2026, 16 फरवरी 2026 और 24 फरवरी 2026 को भी कार्रवाई की मांग की। शिकायतकर्ता का कहना है कि जब जांच पूरी हो चुकी है और संबंधित पक्षों से स्पष्टीकरण भी लिया जा चुका है, तो फिर कार्रवाई में देरी क्यों हो रही है।
मामले में नया मोड़ तब आया जब जिलाधिकारी अरवल, श्रीमती अमृषा बैंस के आदेश पर 21 फरवरी 2026 को पुनः त्रिसदस्यीय जांच टीम का गठन कर दिया गया। नई टीम को पूर्व में हुई जांच रिपोर्ट और मुखिया द्वारा दिए गए स्पष्टीकरण की पुनः समीक्षा कर विस्तृत प्रतिवेदन देने का निर्देश दिया गया है।
इस निर्णय पर भी सवाल उठने लगे हैं। ग्रामीणों और शिकायतकर्ताओं का कहना है कि जब पहले ही जांच में दोष साबित हो चुका है, तो कार्रवाई के बजाय पुनः जांच कराने का क्या औचित्य है। स्थानीय लोगों के बीच इस मामले को लेकर असंतोष बढ़ता जा रहा है और अब सभी की नजरें जिला प्रशासन की आगामी कार्रवाई पर टिकी हुई हैं।

