अरवल नगर परिषद में सफ़ाई घोटाले की बू? 36 लाख मासिक खर्च, फिर भी शहर गंदगी की चपेट में

अरवल नगर परिषद में सफ़ाई घोटाले की बू? 36 लाख मासिक खर्च, फिर भी शहर गंदगी की चपेट में

Satveer Singh
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अरवल नगर परिषद में सफ़ाई घोटाले की बू? 36 लाख मासिक खर्च, फिर भी शहर गंदगी की चपेट में
36 लाख रुपये की सफ़ाई, फिर भी गंदगी बेहिसाब—अरवल नगर परिषद की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल

अरवल नगर परिषद द्वारा साफ़-सफ़ाई के नाम पर हर महीने करीब 36 लाख रुपये की निकासी की जा रही है, लेकिन ज़मीनी हकीकत इन दावों के बिल्कुल उलट नज़र आती है। नगर परिषद क्षेत्र में प्रवेश करते ही जाम नालियां, सड़कों पर कचरे के ढेर, टूटे स्लैब और चारों ओर फैली दुर्गंध यह सवाल खड़ा कर देती है कि आखिर इतनी बड़ी राशि खर्च कहाँ हो रही है।

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि नियमित सफ़ाई का दावा अब केवल काग़ज़ों तक सीमित रह गया है। कई वार्डों में हफ्तों तक झाड़ू नहीं लगती, नालियों की सफ़ाई नहीं होती और कचरा उठाव पूरी तरह अनियमित है। बरसात के दिनों में स्थिति और भी भयावह हो जाती है, जब जाम नालों से गंदा पानी सड़कों पर बहने लगता है, जिससे मलेरिया, डेंगू और अन्य संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।

स्थानीय लोगों के अनुसार, नगर परिषद के प्रत्येक वार्ड में वर्तमान में केवल 3 से 5 सफ़ाई कर्मी तैनात हैं, जबकि अधिकतम किसी वार्ड में 6 कर्मी ही दिखाई देते हैं। जबकि पहले प्रत्येक वार्ड में 10 से 14 सफ़ाई कर्मी कार्यरत रहते थे। सफ़ाई कर्मियों की संख्या में भारी कटौती के बावजूद सफ़ाई बजट में कोई कमी नहीं की गई, जिसने पूरे मामले को और भी संदिग्ध बना दिया है।

नगर परिषद क्षेत्र में कुल 25 वार्ड हैं और नियम के अनुसार हर वार्ड में प्रतिदिन सफ़ाई होना अनिवार्य है। लेकिन धरातल की सच्चाई यह है कि कई इलाकों में एक-एक सप्ताह तक सफ़ाई नहीं होती। नालियां जाम पड़ी हैं, कचरे के ढेर सड़कों पर लगे हैं और दुर्गंध से आम लोगों का जीना मुश्किल हो गया है।

इसी बीच सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है—
👉 जब हर महीने 36 लाख रुपये खर्च हो रहे हैं, तो सफ़ाई दिख क्यों नहीं रही?
👉 क्या यह राशि वास्तव में सफ़ाई कार्यों पर खर्च हो रही है या केवल काग़ज़ों में ही खपाई जा रही है?

नगर परिषद के जिम्मेदार अधिकारी इस गंभीर मुद्दे पर या तो मौन साधे हुए हैं या फिर औपचारिक जवाब देकर जिम्मेदारी से बचते नज़र आते हैं। वहीं, नगरवासियों में गहरा आक्रोश व्याप्त है। सामाजिक संगठनों और जागरूक नागरिकों ने उच्चस्तरीय जांच, साफ़-सफ़ाई मद में हुए मासिक खर्च की ऑडिट रिपोर्ट सार्वजनिक करने, और दोषी अधिकारियों व एजेंसियों पर सख़्त कार्रवाई की मांग की है।

अब देखना यह है कि जिला प्रशासन और नगर विकास विभाग इस मामले में कब तक आंखें मूंदे रहता है, या फिर 36 लाख रुपये प्रति माह की इस कथित सफ़ाई व्यवस्था की सच्चाई सामने लाने के लिए कोई ठोस कदम उठाए जाते हैं।

जनता का सवाल बिल्कुल साफ़ है—
“जब शहर गंदगी में डूबा है, तो 36 लाख रुपये प्रति माह आखिर जा कहाँ रहे हैं?”

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