यूके की नेशनल फाउंडेशन फॉर एजुकेशनल रिसर्च (NFER) की ताज़ा रिपोर्ट ने वैश्विक नौकरी बाज़ार के आकाश में एक नई हलचल खड़ी कर दी है। रिपोर्ट बताती है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की तेज़ प्रगति आने वाले दस वर्षों में तकरीबन 30 लाख नौकरियों पर बादल की तरह छा सकती है। बदलती तकनीक की यह लहर, जिस पर दुनिया सवार है, कई कामों की परिभाषा बदलने वाली है — कुछ को पुनर्जीवित करेगी, तो कुछ को किनारे कर देगी।
सबसे अधिक खतरा एडमिनिस्ट्रेटिव, सेक्रेटेरियल, कस्टमर सर्विस, ट्रेडिंग और मशीन ऑपरेशन से जुड़े रोल पर है। रिपोर्ट के अनुसार श्रम बाज़ार में बदलाव अब शुरुआती अनुमान से तीन गुना तेज़ गति से हो रहे हैं, मानो समय खुद एक तेज़ भागते सर्वर की तरह काम कर रहा हो। वहीं दूसरी ओर, इंजीनियर, साइंटिस्ट और टीचर जैसे हाई-स्किल्ड प्रोफेशनल्स की मांग मजबूत होती दिख रही है। तकनीक काम को बढ़ाती है, उत्पादकता को भी और कई मामलों में वर्कलोड को भी — इसलिए इन पेशों में अवसर बढ़ते दिखाई दे रहे हैं।
दिलचस्प बात यह है कि अनुभवी लोगों के साथ-साथ नए फ्रेशर्स भी इस बदलाव की तपिश महसूस करेंगे। AI के व्यापक उपयोग से कई वेटरन्स की भूमिकाएँ अप्रासंगिक हो सकती हैं और नए प्रवेशकों के लिए शुरुआती सीढ़ियाँ भी थोड़ा फिसलन भरी हो सकती हैं।
फिर भी उम्मीद की एक किरण चमकती है। अगले दशक में 2.3 मिलियन नई नौकरियों के पैदा होने का अनुमान है, हालांकि ये नौकरियाँ मुख्यतः साइंस, इंजीनियरिंग और लॉ जैसे अधिक स्किल वाले क्षेत्रों में होंगी। यह अंतर कम स्किल वाले वर्कर्स को पीछे धकेल सकता है यदि उन्हें समय रहते नई क्षमताओं से लैस नहीं किया गया।
रिपोर्ट छह आवश्यक स्किल्स पर ज़ोर देती है — सहयोग, संचार, रचनात्मक सोच, सूचना साक्षरता, संगठन और योजना, तथा समस्या-समाधान। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि वर्कर्स को री-ट्रेन करने की प्रक्रिया तुरंत शुरू न हुई, तो आने वाला दौर कई लोगों के लिए और कठिन हो सकता है। AI का यह युग अवसर भी लाता है और चुनौती भी — फर्क बस इसी बात का है कि कौन इससे तालमेल बिठा पाता है।
