पटना। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 ने प्रदेश की चुनावी राजनीति में कई पुरानी धारणाओं को ध्वस्त कर दिया और कुछ नए संकेत भी उकेरे। इस चुनाव में जिस रिकॉर्ड ने सबसे अधिक ध्यान खींचा, वह है—विधानसभा में एक भी निर्दलीय विधायक का न पहुंचना। यह पहली बार है जब बिहार विधानसत्ता में निर्दलीयों की एंट्री शून्य रही। कभी 33 तक पहुंचने वाली निर्दलीयों की संख्या 2020 में 1 रह गई थी और 2025 आते-आते पूरा ग्राफ जमीन पर आ गया।
चुनाव परिणाम बताते हैं कि मतदाता अब स्पष्ट ध्रुवीकरण की ओर बढ़ रहे हैं। तीसरी ताकत की जमीन तेजी से सिकुड़ रही है। वर्ष 2000 में अन्य दलों और निर्दलीयों को कुल 36.8% वोट मिलते थे, जो इस बार घटकर मात्र 15.5% रह गए। 2005 फरवरी चुनाव में यह आंकड़ा 49.4% तक पहुंचा था। वहीं 2020 के चुनाव में 25.5% मिले ‘अन्य’ वोट इस बार 10% गिरावट के साथ 15.5% पर सिमट गए। यह गिरावट ही एनडीए को निर्णायक बढ़त दिलाने वाला कारक बनी।
आंकड़ों के अनुसार महागठबंधन का कोर वोटर उनके साथ बना रहा। उनका वोट प्रतिशत 2020 के 37.2% से बढ़कर 37.9% हुआ, लेकिन बढ़ा हुआ वोट सीटों में तब्दील नहीं हो पाया। विश्लेषकों का दावा है कि तीसरी शक्ति से खिसककर 10% वोट सीधे एनडीए खेमे में चले गए, जिसने परिणामों को पूरी तरह बदल दिया।
निर्दलीयों के इतिहास पर नजर डालें तो 1952 से 1985 के बीच उनकी संख्या 12 से 33 के बीच रही। लालू यादव के सत्ता में आने के बाद यह घटने लगी—1990 में 30 से शुरू होकर 2010 में 6, 2015 में 4 और 2020 में केवल 1 रह गई। उस आखिरी निर्दलीय सुमित सिंह को मंत्री भी बनाया गया था, लेकिन इस बार जेडीयू टिकट पर चुनाव हार गए।
दिलचस्प बात यह भी है कि निर्दलीयों ने कई सीटों पर परिणाम प्रभावित किए। राजद की बागी उम्मीदवार रितु जायसवाल को परिहार में सबसे अधिक वोट मिले, जिससे मुकाबले का समीकरण पूरी तरह उलट गया।
बिहार चुनाव 2025 साफ संकेत देता है—प्रदेश की राजनीति अब दो ध्रुवों के बीच सिमट रही है और निर्दलीयों का स्वर्णकाल इतिहास की किताबों में सहेज दिया गया है।
