दिल्ली। बिहार विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद कांग्रेस पार्टी अब अपने ही उठाए गए सवालों के घेरे में आ गई है। चुनाव से पहले पार्टी ने जोर-शोर से ‘वोट चोरी’ मुद्दा उठाया था, बड़े-बड़े आरोप लगाए, और राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में हज़ारों पन्ने लहराकर चुनाव आयोग और भाजपा पर गंभीर सवाल खड़े किए थे। लेकिन नतीजों ने सारी रणनीतिक गहमागहमी को ध्वस्त कर दिया—कांग्रेस 61 में से सिर्फ 6 सीटें जीत सकी। अब पार्टी की आंतरिक बैठक में नेताओं ने स्वीकार किया कि शायद उन्होंने “वोट चोरी” पर ज़रूरत से ज़्यादा ध्यान दे दिया और असली मुद्दों को पीछे छोड़ दिया।
पार्टी नेताओं का कहना है कि महागठबंधन महंगाई, बेरोज़गारी, माइग्रेशन और भ्रष्टाचार को चुनावी विमर्श में मजबूती से नहीं ला पाया। उनकी मानें तो गठबंधन में तेजस्वी यादव भले मुख्यमंत्री चेहरा थे, लेकिन एनडीए की घोषणाएँ और चुनावी तैयारियाँ जनता को ज्यादा भरोसेमंद लगीं। कुछ वरिष्ठ नेताओं ने कांग्रेस हाईकमान के सामने हार के तीन मुख्य कारण भी रखे।
पहला—पार्टी ने SIR और ‘वोट चोरी’ पर इतना फोकस किया कि असल मुद्दे धुंध में गुम हो गए। दूसरा—सरकार की ओर से महिलाओं को 10,000 रुपये देने की योजना चुनाव का गेमचेंजर साबित हुई। तीसरा—बूथ मैनेजमेंट की कमजोरी, गठबंधन दलों के बीच तालमेल की कमी और AIMIM के कारण सीमांचल में वोटों का बिखराव।
TOI की रिपोर्ट बताती है कि कई नेताओं ने आरोप लगाया कि भाजपा ने चुनाव “फिक्स” करने के लिए कई टूल्स—SIR, EVM, वोट खरीदना, प्रशासनिक दबाव—का इस्तेमाल किया। हालांकि समीक्षा बैठक में राहुल गांधी ने यह भी कहा कि हार की जिम्मेदारी वह भी बराबर साझा करते हैं।
बैठक में लगभग 70 नेताओं ने अपनी बातें रखीं। कुछ जगह नेताओं के बीच बहस भी हुई। कईयों ने उम्मीदवार चयन को बड़ी गलती बताया, जबकि भाजपा कई महीने पहले से विशाल चुनावी टीम के साथ मैदान में उतर गई थी। कुछ नेताओं ने सुझाव दिया कि राज्य स्तर पर भी इस्तीफों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
साथ ही, RJD के साथ गठबंधन पर भी सवाल उठाए गए, लेकिन राहुल गांधी ने यह पूछकर इस तर्क को खारिज कर दिया कि उन सीटों पर कांग्रेस क्यों हार गई जहाँ RJD उनका मुकाबला ही नहीं कर रही थी।
