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भारतीय रुपये की गिरावट पर SBI रिसर्च का बड़ा दावा, 2026 में 87 के स्तर पर लौट सकता है रुपया

नई दिल्ली। भारतीय रुपये में जारी गिरावट ने बाजार और आर्थिक विशेषज्ञों के बीच नई बहस छेड़ दी है कि आखिर यह कमजोरी कितनी दूर तक जा सकती है। इसी बीच SBI रिसर्च की ताजा रिपोर्ट ‘इन रूपी वी ट्रस्ट’ ने रुपये के भविष्य को लेकर एक अहम आकलन पेश किया है। रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय रुपया इस समय डीवैल्यूएशन के तीसरे चरण से गुजर रहा है, जहां एक साथ रुपया और अमेरिकी डॉलर दोनों दबाव में हैं।

क्यों कमजोर हो रहा है रुपया?

SBI रिसर्च के मुताबिक, रुपये में गिरावट की मुख्य वजहें घरेलू व्यापक आर्थिक दबाव, वैश्विक अनिश्चितता, भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक व्यापार में व्यवधान हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि मार्कोव रिजीम-स्विचिंग मॉडल के विश्लेषण के आधार पर रुपया करीब छह महीने तक दबाव में रह सकता है। हालांकि इसके बाद इसमें तेज रिकवरी की संभावना जताई गई है।

2026 में 87 के स्तर पर लौट सकता है रुपया

रिपोर्ट का अनुमान है कि गिरावट का यह दौर खत्म होने के बाद रुपया करीब 6.5 फीसदी की मजबूती दिखा सकता है। यदि वैश्विक हालात सुधरते हैं और पूंजी प्रवाह में स्थिरता आती है, तो 2026 में रुपया फिर से 87 रुपये प्रति डॉलर के स्तर तक पहुंच सकता है।

RBI के हस्तक्षेप से संभला रुपया

मंगलवार को भारतीय रुपया 91 रुपये प्रति डॉलर के पार जाकर अपने सर्वकालिक निचले स्तर पर पहुंच गया था। हालांकि, अगले ही दिन इसमें जोरदार सुधार देखने को मिला। बुधवार को रुपया 90.3475 प्रति डॉलर पर कारोबार करता दिखा, जो पिछले बंद भाव 91.0275 के मुकाबले 1 फीसदी से ज्यादा की तेजी थी।

विशेषज्ञों के अनुसार, इस उछाल के पीछे भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) का मजबूत हस्तक्षेप अहम कारण रहा। सरकारी बैंकों द्वारा डॉलर की लगातार बिक्री से बाजार में स्थिरता आई और रुपये में पिछले सात महीनों की सबसे बड़ी एकदिनी तेजी दर्ज की गई। रुपये में 1.03 फीसदी की मजबूती आई, जो 23 मई 2025 के बाद सबसे बड़ा उछाल माना जा रहा है।

विदेशी निवेश में गिरावट बना बड़ा कारण

SBI रिसर्च ने रुपये की कमजोरी के पीछे एक बड़ा संरचनात्मक बदलाव भी बताया है। रिपोर्ट के अनुसार, 2007 से 2014 के बीच भारत में औसतन 162.8 अरब डॉलर प्रति वर्ष का विदेशी पोर्टफोलियो निवेश आता था, जिससे रुपये को मजबूती मिलती थी।
लेकिन 2015 से 2025 के दौरान यह औसत घटकर 87.7 अरब डॉलर रह गया है। अकेले 2025 में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की 10 अरब डॉलर से अधिक की निकासी ने रुपये पर अतिरिक्त दबाव बनाया।

टैरिफ और डॉलर की बढ़ती मांग

रिपोर्ट में बताया गया है कि भू-राजनीतिक तनाव और टैरिफ घोषणाओं के बाद से रुपये में करीब 5.7 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। इसके अलावा, जुलाई 2025 से आयातकों और निर्यातकों द्वारा बढ़ी हेजिंग गतिविधियों के चलते डॉलर की मांग तेजी से बढ़ी है। फॉरवर्ड मार्केट में कुल अतिरिक्त मांग 145 अरब डॉलर तक पहुंच गई, जिससे RBI को हस्तक्षेप करना पड़ा।

निष्कर्ष

हालांकि मौजूदा हालात में रुपया दबाव में नजर आ रहा है, लेकिन SBI रिसर्च रुपये को लेकर आशावादी है। रिपोर्ट का मानना है कि यदि वैश्विक जोखिम घटते हैं और विदेशी पूंजी प्रवाह में सुधार होता है, तो आने वाले समय में रुपया मजबूती के रास्ते पर लौट सकता है और 2026 में 87 के स्तर तक पहुंचना संभव है

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