पटना में बिहार से मौसमी पलायन पर मंथन, 63 लाख से अधिक मजदूर हर साल करते हैं प्रवासन

पटना में बिहार से मौसमी पलायन पर मंथन, 63 लाख से अधिक मजदूर हर साल करते हैं प्रवासन

Satveer Singh
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पटना। बिहार से होने वाले मौसमी प्रवासन की गंभीर समस्या पर गुरुवार से राजधानी पटना स्थित अनुग्रह नारायण सिंह इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज में राष्ट्रीयस्तर के दो दिवसीय परामर्श कार्यक्रम की शुरुआत हुई। इस आयोजन में बिहार के साथ-साथ गुजरात, केरल, राजस्थान, झारखंड और दिल्ली से आए शिक्षाविद, शोधार्थी, मजदूर संगठनों के प्रतिनिधि, स्वैच्छिक संस्थाएं और सरकारी अधिकारी शामिल हुए।

कार्यक्रम के पहले सत्र में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज के पूर्व निदेशक पुष्पेंद्र कुमार ने जातिगत आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि बिहार से हर साल 63 लाख से ज्यादा श्रमिक पलायन करते हैं। इनमें से केवल 25 प्रतिशत मजदूर राज्य के अंदर ही काम के लिए जाते हैं, जबकि 71 प्रतिशत अन्य राज्यों और तीन प्रतिशत से अधिक विदेशों में रोजगार के लिए जाते हैं। बिहार में पलायन पर लंबे समय से काम कर रहे प्रो. राम बाबू भगत और अविरल शर्मा ने भी अपने शोध निष्कर्ष प्रस्तुत किए। सत्र का संचालन साउथ एशिया यूनिवर्सिटी के डॉ. रवि ने किया।

इसके बाद प्रवासी मजदूरों के अधिकारों और उनकी सुरक्षा को लेकर सरकार व स्वैच्छिक संस्थाओं के प्रयासों पर चर्चा हुई। श्रम संसाधन विभाग के सहायक श्रम आयुक्त डॉ. गणेश झा ने बिहार सरकार की योजनाओं की जानकारी दी। एक्शन ऐड के शत्रुघ्न दास ने गया जिले में ईंट-भट्टा मजदूरों की स्थिति और बंधुआ मजदूरों को मुक्त कराने के मामलों को साझा किया। राजस्थान और केरल से आए यूनियन प्रतिनिधियों ने भी अपने अनुभव रखे।

तीसरे सत्र में बाल श्रम और मानव तस्करी जैसे गंभीर मुद्दों पर विमर्श हुआ। राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग, न्याय नेटवर्क, अदिति संस्था और यूनिसेफ के प्रतिनिधियों ने राज्य की जमीनी हकीकत सामने रखी। अंतिम सत्र में भविष्य की रणनीति और ठोस कदम उठाने पर चर्चा हुई।

यह परामर्श कार्यक्रम बिहार से हो रहे पलायन, मजदूरों के अधिकार और मानव तस्करी जैसे मुद्दों पर राष्ट्रीय स्तर पर नई बहस और समाधान की दिशा तय करता नजर आया।
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