नई दिल्ली। चार नए लेबर कोड को रद्द करने और मज़दूरों के बुनियादी अधिकारों की रक्षा की मांग को लेकर मज़दूर अधिकार संघर्ष अभियान (मासा) के आह्वान पर रविवार को देश भर में ज़ोरदार प्रदर्शन और रैलियाँ आयोजित की गईं। इस मौके पर “अखिल भारतीय मज़दूर अधिकार दिवस” मनाया गया, जिसमें दिल्ली समेत कई राज्यों में हज़ारों मज़दूर सड़कों पर उतरे।
नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर भारी पुलिस दबाव के बावजूद एक हज़ार से अधिक मज़दूरों ने प्रदर्शन में हिस्सा लिया। इनमें ऑटोमोबाइल, गारमेंट, इलेक्ट्रॉनिक्स, घरेलू कामगार, मनरेगा, निर्माण, एमएसएमई, गिग और स्कीम मज़दूर शामिल थे। दिल्ली-एनसीआर के साथ-साथ हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान से भी बड़ी संख्या में मज़दूर प्रदर्शन में पहुंचे।
मासा से जुड़े 14 जुझारू मज़दूर संगठनों और ट्रेड यूनियनों के नेताओं ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने मज़दूर संगठनों की आपत्तियों और चेतावनियों को नज़रअंदाज़ करते हुए चार मज़दूर-विरोधी लेबर कोड लागू कर दिए हैं। वक्ताओं ने कहा कि इन कोड्स का उद्देश्य स्थायी नौकरियों को खत्म करना, “हायर एंड फायर” को बढ़ावा देना, यूनियन अधिकारों को कमजोर करना और काम के घंटे बढ़ाना है। इससे मज़दूरों की सुरक्षा और सम्मान दोनों पर गंभीर खतरा पैदा हो गया है।
प्रदर्शन में यह भी कहा गया कि प्रस्तावित ड्राफ्ट राष्ट्रीय श्रम एवं रोजगार नीति 2025 मज़दूरों के हितों के खिलाफ़ है और इससे असमानता व शोषण और बढ़ेगा। नेताओं ने निजीकरण, बेरोज़गारी, महंगाई और विभाजनकारी राजनीति के खिलाफ़ एकजुट संघर्ष का आह्वान किया।
मज़दूरों ने ₹30,000 न्यूनतम मासिक वेतन, सभी के लिए स्थायी और सुरक्षित रोजगार, 8 घंटे का कार्यदिवस, गिग मज़दूरों को श्रमिक का दर्जा, प्रवासी मज़दूरों की सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा की गारंटी जैसी मांगों को ज़ोर-शोर से उठाया।
देश के अन्य हिस्सों—पटना, कोलकाता, चेन्नई, लखनऊ, भुवनेश्वर, लुधियाना, हरिद्वार, रुद्रपुर सहित कई शहरों में भी इसी तरह के प्रदर्शन हुए। मासा ने ऐलान किया कि आने वाले दिनों में लेबर कोड और मज़दूर-विरोधी नीतियों के खिलाफ़ अखिल भारतीय आंदोलन को और तेज़ किया जाएगा।

