भारत ने दुर्लभ खनिजों (Rare Earth Minerals) के क्षेत्र में एक बड़ा और रणनीतिक कदम उठाया है। यह वही खनिज हैं जिन पर चीन दशकों से अपनी पकड़ बनाए हुए है और जिनकी सप्लाई रोककर वह कई देशों की टेक्नोलॉजी और रक्षा इंडस्ट्री पर दबाव बनाता रहा है। अब भारत ने इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने का निर्णय लेते हुए एक महत्वाकांक्षी योजना को लागू करने की मंजूरी दे दी है, जो देश की अर्थव्यवस्था और वैश्विक सप्लाई चेन दोनों के लिए अहम मानी जा रही है।
केंद्र सरकार की कैबिनेट ने 7,280 करोड़ रुपये की Rare Earth Magnet Manufacturing Scheme को हरी झंडी दे दी है। यह योजना अगले सात वर्षों तक चलेगी, जिसमें रेयर अर्थ मिनरल्स के खनन, प्रोसेसिंग, रिफाइनिंग और मैग्नेट निर्माण तक पूरी वैल्यू चेन को भारत में विकसित किया जाएगा। सरकार का लक्ष्य लगभग 6,000 टन Rare Earth Magnets की घरेलू क्षमता स्थापित करना है, जिसका उपयोग हाई-टेक इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रिक वाहनों, रक्षा उपकरणों, सैटेलाइट और नवीकरणीय ऊर्जा तकनीकों में होता है।
रेयर अर्थ के क्षेत्र में अभी दुनिया चीन पर अत्यधिक निर्भर है। चीन वैश्विक रॉ प्रोडक्शन का लगभग 60-70%, और प्रोसेसिंग का 90% हिस्सा नियंत्रित करता है। यह तकनीकी और आर्थिक प्रभुत्व दुनिया की सप्लाई चेन को कई बार बाधित कर चुका है। भारत की नई रणनीति न सिर्फ चीन पर निर्भरता कम करेगी, बल्कि अमेरिकी और यूरोपीय देशों के लिए भी एक नया विकल्प तैयार करेगी, जो चीन की एकाधिकार नीति से परेशान हैं।
विशेष बात यह है कि भारत दुनिया के उन पाँच देशों में शामिल है, जहाँ रेयर अर्थ खनिजों के बड़े भंडार मौजूद हैं। अब यह योजना इन संसाधनों को आर्थिक ताकत में बदलने का मौका देगी।
इस पहल से भारत न सिर्फ घरेलू जरूरतों को पूरा कर सकेगा, बल्कि भविष्य में Rare Earth Magnets का एक महत्वपूर्ण निर्यातक भी बन सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम भारत को ग्लोबल टेक्नोलॉजी सप्लाई चेन में एक निर्णायक भूमिका निभाने का अवसर देगा।

