पटना। बिहार की सियासत में राष्ट्रीय लोक मोर्चा (रालोमो) इन दिनों गंभीर अंदरूनी संकट से गुजर रही है। पार्टी प्रमुख और राज्यसभा सांसद उपेंद्र कुशवाहा के नेतृत्व में चल रही यह राजनीतिक इकाई अब खुलकर बिखराव की कगार पर दिखने लगी है। पार्टी के तीन विधायकों की नाराजगी, संगठनात्मक इस्तीफे और अब मधुबनी विधायक माधव आनंद का अचानक विदेश चले जाना—ये सभी घटनाएं रालोमो के भविष्य को लेकर सवाल खड़े कर रही हैं। यह मामला सिर्फ सत्ता-संतुलन का नहीं, बल्कि पार्टी की वैचारिक दिशा और कार्यकर्ताओं के सम्मान से भी जुड़ गया है।
रालोमो में अंदरूनी खींचतान खुलकर आई सामने
बीते कुछ हफ्तों से रालोमो के भीतर असंतोष की खबरें लगातार सामने आ रही थीं, लेकिन अब घटनाक्रम ने राजनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ा दी है। पार्टी के तीनों विधायक—माधव आनंद (मधुबनी), रामेश्वर महतो (बाजपट्टी) और आलोक सिंह (दिनारा)—लगातार चर्चा के केंद्र में हैं। इनमें से माधव आनंद का देश से बाहर जाना इस पूरे विवाद को और गंभीर बना रहा है।
माधव आनंद ने खुद इस बात की पुष्टि की है कि वह फिलहाल भारत में नहीं हैं। हालांकि उन्होंने इसे निजी कारणों और स्वास्थ्य से जोड़कर बताया, लेकिन पार्टी के भीतर चल रहे विवादों के बीच उनका जाना महज संयोग मानने को राजनीतिक विश्लेषक तैयार नहीं हैं।
लिट्टी-चोखा पार्टी से शुरू हुआ विवाद
कुछ दिन पहले पटना में उपेंद्र कुशवाहा के सरकारी आवास पर लिट्टी-चोखा पार्टी आयोजित की गई थी। इसे पार्टी की एकजुटता और संगठनात्मक मजबूती का संदेश माना जा रहा था। लेकिन इसी कार्यक्रम में रालोमो के तीनों विधायक गैरहाजिर रहे।
माधव आनंद ने स्पष्ट किया कि उन्हें कार्यक्रम की जानकारी थी, लेकिन खराब तबीयत के कारण वे शामिल नहीं हो सके। वे इलाज के लिए दिल्ली गए और वहां से विदेश रवाना हो गए। हालांकि, राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि मंत्री पद न मिलने की नाराजगी ने उन्हें पार्टी गतिविधियों से दूर कर दिया।
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बीजेपी नेता से मुलाकात ने बढ़ाई सियासी गर्मी
विवाद उस वक्त और बढ़ गया जब लिट्टी-चोखा पार्टी के अगले ही दिन माधव आनंद और अन्य विधायकों की तस्वीर बीजेपी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नवीन के साथ सामने आई। सोशल मीडिया पर वायरल हुई इस तस्वीर ने अटकलों का बाजार गर्म कर दिया।
माधव आनंद ने इस मुलाकात को शिष्टाचार भेंट बताया और कहा कि नितिन नवीन से उनके पुराने व्यक्तिगत संबंध हैं। उन्होंने यह भी जोड़ा कि इस मुलाकात को राजनीतिक नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए। बावजूद इसके, पार्टी के भीतर असंतोष के माहौल में इस मुलाकात ने नेतृत्व की मुश्किलें बढ़ा दीं।
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रामेश्वर महतो के बयान से भड़की आग
रालोमो में असंतोष की सबसे मुखर आवाज बने हैं बाजपट्टी विधायक रामेश्वर महतो। उन्होंने पार्टी नेतृत्व पर सीधे सवाल उठाते हुए कहा कि रालोमो अब वंशवाद की राजनीति की राह पर चल पड़ी है।
रामेश्वर महतो ने सार्वजनिक तौर पर मांग की कि उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश को मंत्री बनाए जाने के फैसले में सुधार हो। उनका कहना है कि पार्टी कार्यकर्ताओं और विधायकों की अनदेखी हो रही है। महतो ने दावा किया कि पार्टी के तीनों विधायक इस फैसले से नाखुश हैं और हालात बेहद गंभीर हैं।
आलोक सिंह की चुप्पी भी दे रही है संकेत
दिनारा विधायक आलोक सिंह ने अब तक कोई सार्वजनिक बयान नहीं दिया है। लेकिन उनकी चुप्पी को भी सियासी संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, असंतोष केवल बयानों तक सीमित नहीं है, बल्कि संगठन के अंदर गहरे मतभेद उभर चुके हैं।
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विवाद की जड़: मंत्री पद और वंशवाद का आरोप
पूरा विवाद उस वक्त शुरू हुआ जब बिहार में नई सरकार बनी और रालोमो को एक मंत्री पद मिला। सभी को उम्मीद थी कि पार्टी के किसी निर्वाचित विधायक को मंत्री बनाया जाएगा। लेकिन उपेंद्र कुशवाहा ने अपने बेटे दीपक प्रकाश को मंत्री पद की शपथ दिलवाई।
दीपक प्रकाश को पंचायती राज मंत्री बनाया गया, जबकि वे न तो विधायक हैं और न ही उन्होंने कभी चुनाव लड़ा है। वे पेशे से कंप्यूटर इंजीनियर हैं। इस फैसले ने पार्टी के भीतर तीखा विरोध पैदा कर दिया। इसके बाद रालोमो के सात जिला अध्यक्षों ने इस्तीफा दे दिया, जिससे संगठनात्मक कमजोरी भी सामने आ गई।
माधव आनंद: भरोसेमंद चेहरा, अब असंतुष्ट?
माधव आनंद को लंबे समय से पार्टी का वरिष्ठ और भरोसेमंद नेता माना जाता रहा है। वे पहले रालोमो के प्रधान महासचिव रह चुके हैं और उपेंद्र कुशवाहा के करीबी नेताओं में गिने जाते हैं।
2025 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने मधुबनी सीट से आरजेडी के एक दिग्गज नेता को 20 हजार से ज्यादा वोटों से हराकर अपनी राजनीतिक ताकत साबित की थी। पार्टी के अंदर यह चर्चा भी आम है कि माधव आनंद खुद को मंत्री पद का मजबूत दावेदार मानते थे और मौजूदा फैसलों से असंतुष्ट हैं।
आगे क्या? रालोमो के सामने बड़ी चुनौती
रालोमो के लिए यह संकट केवल सत्ता का नहीं, बल्कि भरोसे और संगठन की मजबूती का भी है। उपेंद्र कुशवाहा के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती पार्टी को टूटने से बचाने और विधायकों व कार्यकर्ताओं का विश्वास वापस जीतने की है।
👉 क्या उपेंद्र कुशवाहा हालात संभाल पाएंगे, या रालोमो में कोई बड़ा राजनीतिक फेरबदल तय है?
बिहार की राजनीति में यह घटनाक्रम आने वाले दिनों में और भी बड़े संकेत दे सकता है। नजरें अब पार्टी नेतृत्व के अगले कदम पर टिकी हैं।

